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मंथन

यह कविता आपको यह पता लगाने में मदद कर सकती है, कि आपके लिए क्या अच्छा है। This poetry can help you to find what is good for you.
सागर मंथन में सबसे पहले निकलता जहर, बडप्पन कहता है इसे पी ले सहज। सागर के मंथन मे जब निकला ज्ञान, चारों वेद है अलौकिक, अनुभूति से जान।

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मंथन
हमारे अंदर सदा चलता रहता है एक मंथन,
एक तरफ खींचे देव, तो एक तरफ खींचे दानव।

सदा मथी जाती रही है माया रूपी सागर,
कभी नहीं भरती इच्छा पूर्ति की गागर।

बुद्धि रहती बीच में, बनकर पर्वत कठोर,
अपनी धुरी पर घुमती, देखती चारों ओर।

बुद्धि रूपी पर्वत को लपेटे, मन रूपी सांप,
चंचल, लचीला, जहरीला, निष्ठुर मन को मान।

बुद्धि रूपी पर्वत, मन रूपी सांप,
माया रूपी सागर को मथ रहे है आप।

सात्विक भोगता देव, तामस भोगता दानव,
मंथन से पहले विचार करले मानव।

सागर मंथन में सबसे पहले निकलता जहर,
बडप्पन कहता है इसे पी ले सहज।

सागर के मंथन मे जब निकला ज्ञान,
चारों वेद है अलौकिक, अनुभूति से जान।

मथते - मथते जब गया 'श्री राम' पर ध्यान,
शिष झुका लेना, रखकर 'श्री हरि' का मान।

सागर मंथन में मिला भौतिकता का प्रमाण,
और क्या मिला, अपनी इन्द्रियों को पहचान।

कूसंगत का साथ होगा तो जीतेगा दानव,
सत्संग का साथ होगा तो जीतेगा मानव।

सत्संग में स्नान कर बन जाओ सुसंस्कृत,
सागर मंथन के अंत में पा जाओगे अमृत।

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