Khyaal The Path Of Truth

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संकटमोचनहनुमान
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संकटमोचनहनुमान पवन से उत्पन्न 'वायु वेग' ढ़क देता है 'सुर्य' को, तब मानो निगल गया 'पवनपुत्र' सुर्य को। अंधेरा ही अंधेरा छा जाता है तब पृथ्वी पर, हर श्वास कहती है प्रभु दया करो हम पर।
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पञ्चतत्वकामन्दिर
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पञ्चतत्वकामन्दिर पुजलें ए मानव 'पंचतत्व का मन्दिर ',
तन मन स्वच्छ करके, चल धर्म पथ पर।
धर्म है तेरा, नि:स्वार्थ कर्म को करना ,
मिथ्या नहीं रह जाएगा तेरा ईश्वर को भजना।
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नयाजमाना
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नयाजमाना बुद्धि का किया विसर्जन, पहुचायाँ अन्नत धाम। वैराग्य नही है जिसमें, कागजों से ढक दिया ज्ञान। शब्दों के ढेर को , मत कहिए ज्ञान। असर्फियों के ढेर में, ज्ञान चाकर समान।
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सच्चाई
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सच्चाई दिल भी मैं, दिमाग भी मैं, अर्पण ही सच्चाई हैं। आत्मा भी मैं, परमात्मा भी मैं, समर्पण ही सच्चाई हैं।
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वो
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वो कुछ शरमाई, कुछ घबराई, जब खिलकर हँस पड़ी थी वो। मैनें पूछा कहाँ जा रही हो तुम, सन-सन, सन–सन गुजर रही थी वो।
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मिट्टी और राख
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मिट्टी और राख मेरी मंजिल तू है, पर तेरी मंजिल मैं हूँ, तू कलंक है या काजल, पर भू पटल मैं हूँ। जीवन के चक्र का एक बिंदु मैं, दूसरा तू है, मैं 'राग' का आरोह हूँ, तो अबरोह तू हैं।
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पञ्चतत्व
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पञ्चतत्व तेरे घर में एक कच्ची मिट्टी पनप रही है, वो सबके प्यार दुलार में पल रही है। उसे तुम जल से गूंथना, हवा में सुखाना, अग्नि में तपाकर एक अच्छा इंसान बनाना।
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दर्शन
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दर्शन दर्शन की चाह थी, सुबह मंदिर का रूख लिया। .... विलम्ब हुआ है मुझ को, दर्शन का समय खत्म हो गया। चार रूपों में देखा तुझको, भंगी, सहायक, बूढ़ा और कन्या। तृप्त हुआ मैं दर्शन पाकर, हर रूप में तूने दर्शन दिया।
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मंथन
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मंथन सागर मंथन में सबसे पहले निकलता जहर, बडप्पन कहता है इसे पी ले सहज। सागर के मंथन मे जब निकला ज्ञान, चारों वेद है अलौकिक, अनुभूति से जान।
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भारत विश्व गुरु
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भारत विश्व गुरु काशी ढुंडे कबीर को, कबीर ढुंढ़यो मोए, विश्व गुरु भारत बने, तब कलम क्यूँ रोए। कलम न लगाए वृक्ष, कलम न बनाए सरोवर, मंगल पर पानी ढुंडे, करें कागज को तर।

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